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July 24, 2016

सुविचार





  😊किसी ने पूछा - 
जब हर कण कण मे भगवान है तो तुम सत्संग क्यूँ जाते हो ?
देने वाले ने बहुत सुंदर जवाब दिया --
"हवा तो धुप में भी चलती है पर, आनंद और चैन, छाँव मे बैठ कर मिलता है।"🌿




आज श्री राधा-कुण्ड की शोभा निराली हो रही है,,श्री प्रियाजी के मन में एक अभिलाषा जगी है कि मैं और प्रियतम होड़ बदकर कुण्ड में तैरने का आनंद लें ,और देखें कि कौन पहले रंग-महल की सीढियों का स्पर्श करता है,,सभी सहचरियां इस बदा-बदी का सोल्लास अनुमोदन करती हैं,श्री प्रिया-प्रियतम कुण्ड के जल में उतर कर तैरने लगते है,साथ में सहचरियां भी तैर रही हैं,कि देखें कौन सर्वप्रथम रंग-महल की सीढियों का स्पर्श करता है,,सहचरियों ने देखा कि श्री प्रियाजी पहले स्पर्श करने वाली हैं,पर अचानक श्री प्रियाजी डुबकी लगा लेती हैं,और श्री प्रियतम बाजी जीत लेते हैं,..
थोड़ी देर बाद श्री ललिताजी श्री प्रियाजी से प्रश्न करती हैं कि ,हे स्वामिनी !जीतते-जीतते डुबकी क्यों लगा ली?
श्री प्रियाजी कहती है,--''मैं अपने प्रियतम की हार नहीं देख सकती,,'''प्रीतम मेरे प्राननि हूँ तें प्यारौ ,,,देखत जाहि परम सुख उपजत,रूप रंग गुन गारौं ''''


मन में बड़ा उतार चढ़ाव होता है भावों का। सत्य कहता हुँ, संतों और रसिकों की समाज में मेरी पहचान मेरे गुरुदेव से होती है तो मन बड़ा खिल उठता है। अपनें को देखता हुँ तो मुँह शर्म से झुक जाता है और गुरुदेव के नाम जुड़नें से ऐसे महान गुरु के शिष्य होने का अभिमान मुख पर आ जाता है।
संत, रसिक मेरी और इशारा कर के मेरा परिचय देते हैं कि यह ' ...के कृपापात्र हैं। वास्तविकता भी यही है, कि गुरुदेव जी की कृपा में कोई कमी नहीं है, इसी पात्र में दोष है, जो उस बरस रही कृपा को पहचान, पकड़, संजो नहीं पाता।
श्री कबीर दास जी के इस दोहे से उनके भाव में अपना भाव मिलानें का प्रयास कर रहा हुँ। सत्य है कि सारी धरती कागज बन जाए, सातों समुद्र का जल अगर स्याही में परिवर्तित हो जाए और सभी वनों के पेड़ कलम रूप धारण कर लें। तब भी मेरे गुरुदेव की महिमा लिखी नहीं जा सकती।
उनकी इतनीं करुणा और अकारण कृपा। आहा! जब अपनें पर ऐसे गुरुदेव की कृपा अनुभूत होती है। तब आपकी कृपा न मिले इसमें कोई संशय नहीं रहता।
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