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June 21, 2016

मेरे प्रिय गुरुदेव -श्रील गुरुदेव


श्रील गुरुदेव ने अपने प्रिय गुरदेव के बारे में कहा 







जब मैं देवानंद गौड़िया मठ में आया तो गुरुदेव नें मुझे हरिनाम दिया। अपनी जप माला दिखा कर पहले कि यह जप माला हैं और यही वो माला है जो गुरुदेव ने मुझे ३० साल पहले दी थी। जब मैं गुरुदेव के कमरे में आया तो उन्होंने पूछा कि तुम कहाँ से हो?  मैंने बताया कि कृष्ण क़ृपा मेरे चाचा हैं, कृष्ण कृपा ब्रहम्चारी और अब वो श्रील मधुसूदन महाराज जी हैं देवानन्द गौड़ीय मठ के। श्रील मधुसूदन महाराज जी मेरे चाचा है वो ७५ साल के हैं। देवानन्द गौड़िय मठ में वह श्रील भक्ति  प्रज्ञान  केशव गोस्वामी महाराज  के साथ थे।  जब वो ७ या ८ साल के थे तब उन्होने अपना गृह का त्याग कर दिया ओर देवानन्द मठ आ गए और गुरुदेव से मिले। गुरुदेव का उनके  प्रति बड़ा ही स्नेह था। 

जब मैं गुरुदेव से पहली बार मिला तो उस समय उन्होंने मुझे हरिनाम दिया। कभी -कभी मैं भक्ति रक्षक श्री धर महाराज जी के मठ जाता था उनकी हरि कथा सुनने। मेरा उनसे बड़ा प्रेम और स्नेह था और उन्होने यह  भी कहा कि में मठ रुक सकता हुँ। तब मैने कहा कि मैं अपने श्रील नारायण गोस्वामी महाराज और अपने चाचा के साथ देवानन्द गौड़ीय मठ में रहता हुँ। उस समय में, मैं केवल २० या २१ साल का था। मैने अभी कोलकत्ता यूनिवर्सिटी से अर्थ शास्त्र की पढ़ाई खत्म की थी। मैं अभी अपनी तरूड अवस्था में था और गुरुदेव काफी विनर्म स्वभाव के थे और मैं उनके साथ रहता था। काफी वर्षो तक  मैंने अपने चाचा मधुसूदन महाराज जी की सेवा की। एक साल बाद फिर गुरुदेव ने मुझे अपने साथ मथुरा चलने को कहा फिर मैं मथुरा आ गया। मैं हमेशा गुरुदेव की सेवा में लगा रहता उनके लिए खाना बनाता उनके चरणों की मालिश करता। (भक्त : और तीर्थ महाराज जी भी )


श्रील गुरुदेव : जब मैं उस समय आया तो श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी शास्त्र के अध्यन में मगन रहते थे। उन्होंने भी सेवा की थी लेकिन जब मैं आया तो तब हम गुरुदेव की सेवा  करते थे। तुम जानते हो , जो भक्ति में नए आए  है गुरुदेव बहुत कृपालु थे हमें भी अपनी सेवा का मौका देते थे। उस समय हम बहुत कम ब्रह्मचारी थे शायद  ५  या  ६ ब्रह्मचारी। प्रेमानन्द प्रभु ,तीर्थ महाराज , माधव महाराज , मैं  और कृष्णदास, जो अब  विवाहित  हैं बाकी लोग आते थे चले जाते थे पर हम हमेशा उनके साथ रहते थे। फिर कुछ वर्षो के बाद रसानंद जो अब श्री धर महाराज ,आए लेकिन वो वृंदावन में रुके। परन्तु  हम हमेशा गुरुदेव के साथ रुकते थे गुरुदेव जहा वहां हम सब साथ में। 




भक्त : क्या श्रील नारायण महाराज सख्त व्यवहार भी करते थे ?

श्रील गुरुदेव :"हाँ ,बड़े प्रेम  और स्नेह के साथ। अगर आप किसी से प्रेम करत हो तो आप उसके साथ सख्त भी होते हो।" ये करो ,वो करो ", और आप अनुसाशन भी करते हो। गुरुदेव का हमारे साथ बड़ा प्रेम और  स्नेह था। इसके साथ ही अनुशासन भी करते और प्रेम ,स्नेह  भी करते थे। प्रतिदिन वो हमको ३ या ४ क्लास देते थे। कभी - कभी  संधर्भ पर।  भक्ति संधर्भ ,कृष्ण संधर्भ , सिर्फ हमारे लिए उस समय बहार का कोई व्यक्ति नहीं आता था। सिर्फ हम लोग ही वहां होते थे गुरुदेव के साथ ,जैव धर्म , मनः शिक्षा, उपदेशामृत।  प्रतिदिन हमें  काफी श्लोक याद करने होते थे। और मठ में खाना बनाना ,सफाई करना आदि सेवा करते थे। प्रतिदिन हमें एक लाख हरिनाम करना होता था। 

क्या आप समझते है इन चीज़ों  को ? भजन  और साधन कीजिये। गुरुदेव ने हमे सिखाया कि हमें कैसे भजन और साधन करना चाहिए। वो जहां भी जाते हैं हमें लेकर जाते। जब वो जयपुर जाया करते थे तब हमें भी साथ लेकर जाते थे और हमें राधागोविन्द  देव जी के दर्शन कराते। और वो हमे नवद्वीप भी लेकर जाते और नवद्वीप परिक्रमा के बाद वापिस मथुरा लेकर आते। गुरुदेव हमेशा हमारा ध्यान रखते थे। उन्होंने हमें सिखाया कि कैसे प्रसादम बनाना चाहिए और कैसे भोग लगाना चाहिये। 

भक्त : क्यों आपने ही सर्वप्रथम भारत से बहार प्रचार किया ?


श्रील गुरुदेव : १९९७-१९९७ में मैं इंग्लैंड गया ,लंदन और वहां प्रचार किया फिर इंग्लैंड से हॉलैंड ,जर्मनी ,फ्रांस। इसी प्रकार प्रचार किया तो गुरुदेव और कृष्ण ब्रह्मचारी गुरुदेव के साथ रहते थे उस समय माधव महाराज,नवीन ब्रहमचारी,कृष्ण ब्रह्मचारी गुरुदेव के साथ रहते थे। मैंने अलग -अलग देशो में प्रचार किया इंग्लैंड , जर्मनी ,फ्रांस ,ब्राज़ील भी ,ब्राजील के पास काफी ऊर्जा शक्ति है। मुझे उनकी भाषा भी नही आती परन्तु मैंने उन्हें बहुत प्रेम और स्नेह दिया और अब वो मेरे शिष्ये हैं। 

भक्त : क्या नारायण महाराज ने आपको ब्राज़ील भेजा ?

श्रील गुरुदेव : हाँ ,गुरुदेव कि बिना कृपा के बिना कहीं जाना संभव ही नही। अभी भी गुरुदेव मेरको प्रेणना दे रहे है और मैं जा रहा हुँ। बिना गुरु कृपा के कौन आता है? इस समय उन्होंने मुझे प्रेणना दी की मैं यह आऊ ,यहाँ से चीन। बिना गुरु की प्रेणना के मैं यहाँ आऊ ये कैसे संभव है? हम तो कठपुतली की तरह है। क्या तुम जानते हो कठपुतली ? एक कठपुतली कुछ नही करती। एक आदमी उसे धागे से खींचता है जिससे वो इधर उधर होती है। गुरु कृपा बहुत जरुरी है। बिना गुरु कृपा के हम क्या कर सकते है ? कुछ भी नही। क्या तुम समझे ? भक्त को जरुरी सोचना चाहिए कि सब कुछ गुरुदेव की कृपा से हो रहा है हमेशा ऐसा विचार करो कि मैं राधारानी की कृपा को नही जानता ,मैं कृष्ण की कृपा को नही जानता ,मैं चैतन्य महाप्रभु की कृपा को नही जानता ,मैं  सिर्फ गुरु कृपा को जानता हुँ। बिना गुरु कृपा के चैतन्य महाप्रभु और राधा कृष्ण की कृपा को प्राप्त करना कैसे संभव है ?क्या तुम्हे समझ आया ?


वैराग्य-युग भक्ति -रसम प्रयत्नैर 
अपययं माम् अनभिप्सुम अंधम 
कृपाम्बुद्धिर यः पर दुख दुःखी 
सनातनम तम प्रभुं आश्रयमि 


(अर्थ :मैं तो अनाभिलषित  हुँ , उस अमृत का पान करने के लिए जो त्याग से संपन है लेकिन सनातन गोस्वामी  क्रृपा के सागर है जो दूसरों के कष्टों को सहन नही कर सकते  परिश्रमपूर्वक मेरको पान करवाया। इसलिए मैंने सनातन गोस्वामी की शरण अपने शिक्षा गुरुदेव के रुप में ग्रहण की। विलाप कुसुमांजलि -६ श्रील रघुनाथदास  गोस्वामी )


जब मैं उन्हें याद करता हुँ तो व्यकत् करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। उनका हमसे बहुत प्रेम और स्नेह था। उस समय हम बहुत  उत्साह के साथ गुरुदेव की सेवा करते थे। अब गुरु हमारे हृदय में हैं 

हरिबोल