फ़ोटो
ऑडियो
वीडियो

June 22, 2016

भागवत कथा अकोला २०१५

श्री भागवत सप्तहा हमारे प्रिय गुरुदेव भक्ति वेदांत वन गोस्वामी महाराज 

द्वारा, अकोला शहर महारास्ट्रा ,भारत में






श्रील भक्ति वेदांत वन महाराज भागवत सप्ताह २०१५ -श्रीमद् भागवत की कथा श्रवण , कीर्तन के लिए यहाँ आए हैं। सात दिन हम भागवत कथा श्रवण करेंगे। इस भागवत का तात्पर्ये क्या है ?
(भा) शब्द का अर्थ है -प्रकाश ,स्वयं भगवान प्रकाशवान है। इस भागवत कथा को श्रवण करने से हृदय के ताप और अन्धकार नष्ट हो जाएंगे।
जैसे दीपक जला दो तो अन्धकार दूर हो जाता है उसी प्रकार भागवत कथा को श्रवण करने से हृदय के सभी पाप ,ताप और अन्धकार दूर हो जाएंगे।
(ग ) शब्द का अर्थ है - गति ,इस भागवत कथा को श्रवण करने से भगवान सर्वोत्तम गति को प्रदान करते है। धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष यह चतुःपद है। इसके पश्चात् पंचम पुरषार्थ। भगवान इस भागवत प्रेम को जीव के हृदय में प्रदान करते है। गति प्रेम को प्रदान करते है।
(त ) शब्द का अर्थ हैं - तारण भगवान समस्त दुःखो का तारण करते है।
(व ) शब्द का अर्थ है - वरिष्ठ जितने भी प्रकार के ग्रन्थ है वेद ,पुराण भागवतम सबसे वरिष्ठ ग्रन्थ है।
इसी प्रकार हमारे आचार्यपाद नें भागवत कथा का वर्णन किया है।
सात दिन ही क्यों भागवत कथा करते है ? ८ दिन क्यों नही ? १५ दिन क्यों नही ?
सप्त दिन ही क्यों ? इस संदर्भ में हमारे आचार्यपाद कहते हैं
नित्यम् भागवत सेव्याः।।
नित्यम हर रोज ,प्रतिदिन भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए। कितने
दिन होते है ? सात दिन सोम ,मंगल, बुध, वीर ,शुक्र शनि रवि। आठवा दिन है ही नहीं, इसलिए कहा "नित्यं भागवत सेव्यम् " शरीर में सात ग्रन्थियाँ है। भागवत कथा श्रवण करने से सात ग्रन्थियाँ जो है वो नस्ट हो जाती है। हमारे शरीर मे साथ गाँठ लगी हुई है। जैसे हम किसी को रस्सी से बांध देते हैं और सात गाँठ लगा देते है। रक्त ,रस ,मास, मजक ,चामबक हाठी। सबसे बड़ी गाँठ किस में है इस संसार में। हम बंध गए है ये सबसे बड़ी गाँठ है। परन्तु जीव भागवत कथा श्रवण कर इस संसार की ग्रन्थिओ और बन्धनों से मुक्त हो कर भगवान को प्राप्त कर सकता है।



इससे और भी अधिक अविद्या, राग, द्वेष, अस्मिता, अभिनिवेश, मान, अभिमान अनेक प्रकार की ग्रन्थियाँ इस शरीर में है। मन के द्वारा बंधी हुई हैं।
मन के द्वारा ही हम बद्ध है और मन के द्वारा ही हम मुक्त हो सकते है। इस प्रकार भागवत कथा का श्रवण करने से सब प्रकार की गाँठे खुल जाएंगी और जीव साक्षात् भगवान को प्राप्त हो जाएगा। इस कथा को यदि आप श्रद्धा, लगन,के साथ श्रवण करें, कीर्तन करे और स्मरण करे तो साक्षात् भगवान का साक्षात्कार कर सकते है। यह भागवत साक्षात् भगवत स्वरुप है, कोई ग्रन्थ नही। साक्षात् भगवान है। द्वादश स्कन्ध में श्रीमद भागवतम को साक्षात् भगवान कहा गया है। द्वादश यानि बारह ,भगवान के अंग कहा जाता है प्रथम और द्वितीय स्कन्ध भगवान के चरणों को कहा जाता है। तृतीय और चतुः स्कन्ध भगवान की जंघाओं को कहा जाता है। पंचम स्कन्ध भगवान की नाभि को कहा जाता है। षष्टम स्कन्ध भगवान के वक्शस्थल को कहा जाता है। सप्तम और अष्टम स्कन्ध भगवान के बाहु (भुजाएँ ) को कहा जाता है। नवम स्कन्ध भगवान के कण्ठ को कहा जाता है। दशम स्कन्ध भगवान का मुखारविन्द,एकादश स्कन्ध ललाट को कहा जाता है द्वादश स्कन्ध भगवान के मस्तिष्क को कहा जाता है।


स्वयं भगवान इस कलियुग में जीव के कल्याण के लिए प्रकट हुए है। स्वयं जब भगवान द्वापर युग के अंत में और कलियुग के प्रारंभ में ही उस कलियुग के बद्ध जीव के कल्याण के लिए भागवत रुप में प्रकट हो गए। आप लोगो ने कई बार भागवत कथा श्रवण की जिस प्रकार एक व्यक्ति विषयी को जानता है तो उस विषयी के प्रति श्रद्धा उत्पन होती है उसी प्रकार व्यासदेव ने भागवत के महात्मय का वर्णन किया है। दक्षिण देश में तुंग भद्रा नदी के तटपर आत्मदेव नाम के एक ब्राह्मण पधारे, जिसके पास अति धन सम्पदा थी। ब्राह्मण था और ऊपर से अति धनी था परन्तु सुखी नहीं था। यदि हम विचार करके देखे तो इस संसार में कोई भी सुखी नही है दरिद्र कहते हैं कि धनी सुखी हैं, धनी कहते हैं महाजन सुखी हैं, महाजन कहते हैं कि राजा सुखी हैं, राजा कहता हैं, महाराजा सुखी हैं, महाराज कहते इन्द्र सुखी हैं, इन्द्र कहते मैं सुखी नही हुँ। सुखी कौन है? ब्रह्मा जी सुखी हैं इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वाले सुखी है,जिसके चार मुख हैं। ब्रह्मा जी कहते नही-नही मैं सुखी नहीं हुँ। सुखी कौन है? भगवान का भजन करने वाला सुखी है। इस संसार का एक नाम है शायद आप जानते होंगे दुनिया भी कहा जाता है। दुनिया शब्द का अर्थ में बताता हुँ। संस्कृत में दुन धातु का अर्थ है दु:खी। इस संसार में दुःख ही है। कोई बर्फ के देश में जाए जहां -१४ डिग्री तापमान है। उस स्थान पर जाकर वह अग़्नि का अनुसंधान करे तो क्या प्राप्त हो जाएगी ? नही अग़्नि और बर्फ दोनों विजातीय हैं। बर्फ के सामने आग और आग के सामने बर्फ, उसी प्रकार हम अनुसंधान कर रहे हैं हम सुख चाहते है पर हम सुख की और नही जा रहे, क्या हम दुःख के स्थान पर जाकर सुख की प्राप्ति कर सकते हैं? कदापि संभव नही। इसलिए कहते है ये जीवन सुख दुःख का मेला है। अनेक सम्पत्ति होने के बाद भी वह सुखी नहीं था क्योंकि उसके पास कोई पुत्र कन्या नहीं थी। एक दिन इधर उधर यमन करते हुए एक स्थान पर जाकर बैठा। भगवत इच्छा से एक संत महात्मा निकट में आ गए। ओह महात्मा कहकर आत्म देव ब्राह्मण फुट -फुट कर महात्मा के चरणों को पकड़ कर रोने लगे। आँखो से आंसू की बाढ़ से महात्मा के चरणों को भिजो दिया। महात्मा कहने लगे क्यों रो रहे हो?
आत्मदेव ब्राह्मण मेरे घर में सब कुछ है धन, सम्पत्ति, सब कुछ परन्तु मेरे कोई पुत्र, कन्या नहीं अतः ऐसा आशीर्वाद दीजिये जिससे मेरे संतान हो जाए। महात्मा तो त्रिकाल दर्शी है ,उनके ललाट को देख कर बता दिया हे आत्मदेव ब्राह्मण तुम्हारे सात जन्म तक कोई सन्तान होने की कोई संभावना नही है। एक जन्म नही सात जन्म, क्योंकि इस संसार में हम जो भी प्राप्त करते है अपने कूट जन्मो के 

कारण। पूर्व पूर्व जन्म में जैसे हमने कर्म किया है वो सभी हमारे पास आ जाते है। कोई दुःख चाहता है क्या? इस संसार में आप लोग हाथ उठाइये के महाराज हम दुःख चाहते है। क्यों दुःख आ जाता है?
रोग, शोक, जरा, व्याधि जिस वस्तु को हम नही चाहते वह क्यों आ जाता है? बिना बुलाए ही। कहते है यह हमारे प्रराब्ध के फल से जैसे-जैसे पूर्व जन्मों में हमने क्रम किया है उसी क्रम का फल है। हमने मीठे
आम का बीज उगाया तो मीठा आम मिला और यदि काँटे का बीज लगाया। काँटे से तात्पर्ये है की जैसे पूर्व -पूर्व जन्मों में हमने जैसे-जैसे कार्ये किये अच्छे या बुरे अगर पिछले जन्म में किसी का धन हड़प लिया ,किसी जन्म में दान पुण्य किया। उसका फल निष्क्रिय नही होगा। यह सुख दुःख हमारे पूर्व जन्मों के अनुसार है। उसका फल हमें भोगना ही पड़ेगा प्रय्तेक वस्तु की क्रिया समान और उसके विपरीत होती है। लोग समझते हैं कि हम किसी के धन को हड़प करके ईमारत बना लेंगे। परन्तु वो धन जाएगा किसी न किसी जन्म में, कभी न कभी। एक छोटी सी कहानी कई साल पहले हमारे उत्तर प्रदेश में एक पत्रिका निकलती है। उसमे एक लेख आया था एक दिन दो मित्र किसी काम से कही जा रहे थे। उस समय दोनों भाई ने पांच पांच रुपए लेकर यानि दस रुपए में दोनों ने एक लॉटरी खरीदी। सिर्फ ५ -५ रुपए लगाऐ और वास्तव में उनकी एक लाख की लॉटरी लग गया। दोनों बहुत प्रसन हुए साथ ही साथ दोनों मित्रो ने ५०-५० हजार रुपए आधा आधा बाँट लिया। रात हो गयी दोनों मित्र होटल में जाकर ठहरे। एक मित्र विचार करने लगा ५० हजार मेरे पास है मित्र के ५० हजार यदि किसी तरीके से इससे में ले लु तो पूरा एक लाख मेरे पास आ जाएगा आज से २५-३० साल पहले की बात है ,३० -४० साल पहले की। उसने क्या की जब दोनों होटल में रहने लगे तो एक मित्र के खाने में कुछ जहर दाल दिया। बस उसके दस्त हो गया फिर वो बेचारा प्राण छोड़ दिया। किसी को पता नहीं था वो पैसा कहा से आया वो एक लाख रुपए कहाँ से प्राप्त हुआ। जब चला गया तो बोल दिया इसको फ़ूड पॉइज़निंग हो गया मतलब खाने में कुछ गड़बड़। एक लाख रुपए लेकर गॉव में चला गया और उस मित्र के परिवार से कहने लगा कि भाई हमारे साथ गए और फ़ूड पॉइज़निंग हो गया। उस एक लाख रुपए में से १०,००० रुपए दे करके शहर निकल गया। उसमे से दस हजार रुपए दे दिया, जेब में कितना रहा नब्बे हजार अपना पचास और मित्र का चालीस हजार और नब्बे हजार का क्या की, व्यापार चालू की। देखते-देखते उनका व्यापार बड़ा होने लगा बस कुछ सालो में वह करोड़पती बन गया। वास्तव में बोलू ये सत्ये घटना है आज से ४० साल पहले की बात है तो करोड़पती बन गए। उनका लड़का हो गया। १८ -२० साल का लड़का हो गया, लिखाया,पढ़ाया अच्छा ग्रेजुएशन कर दिया। शादी के लिए सुंदर लड़की भी तैयार हो गई। विवाह होने वाला था, यहाँ तक की विवहा से पहले एंगेजमेंट भी हो गयी थी। दो -तीन महीने हुए होंगे अचानक उनके बेटे के पेट में बहुत दर्द होने लगा। डॉक्टर को दिखाया बड़े बड़े डॉक्टरों को दिखाया उनकी बिमारी क्या है ? किसी को पता नहीं चला। पैसा बहुत खर्च कर दिया।बच्चे का शारीर बड़ा दुबला पतला हो गया। फिर दुबई ले गए दुबई के बड़े हॉस्पिटल में भर्ती करवाया। व्यापार पूरा समाप्त हो गया। सारा पैसा अपने बच्चे के लिए लगा दिया। बैंक में जो था। सारा व्यापार डुब गया। कई महीने,बड़े-बड़े हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने देखा, देश-विदेश के बड़े बड़े डॉक्टर होते है। टेस्ट किया पर कुछ नहीं पता चला क्या बिमारी है। अंत में डॉक्टर ने कहा तुम्हारा बालक नहीं बचना। हम लोगो के हाथ में नहीं इंडिया ले जाओ। बेचारा रोने लगा। हॉस्पिटल में बेड पर बच्चा सोए हुए है। उसके पिता जी सिरहाना पर बैठे है। भूल गए आज से २० साल पहले की बात , भूल गए किसी का पैसा हड़प के क्या-क्या किया। चीख करके कहने लगे ये मेरे जीवन की क्या करम फल है। जो मेरा बच्चा आज मरने जा रहा है मेरा सारा व्यापार, मेने करोड़ो रुपए खर्च कर दिए. मेरा सारा व्यापार भी खत्म हो गया मेरे कर्म क्या है। ऐसा चिन्तन करने लगे रत के १२ बजे वही बच्चा सोए थे। मरने वाले थे। बिलकुल ऐसे खड़े हो गए और पिता जी के गले से ऐसे पकड़ कर कहने लगे पिता जी क्या सोच रहे हो? सारा सम्पति चला गया। पिता जी क्या जानते हो आज से २० साल पहले की बात आपके मित्र से आप कुछ पैसा हड़प लिया। उनके जहर देकर भी आप मार दिया। सारा वृतान्त सुनाने के बाद कहने लगे की मैं ही वो मित्र हुँ। मैं आज आपके पुत्र के रूप में आया हुँ और आपकी सारी सम्पत्ति लेकर जा रहा हुँ सूत समेत ऐसा कह कर वो बालक प्राण त्याग दिए। " बोलो वृदावन बिहारी लाल की जय"
वास्तव में यह सत्ये है कोई माने या नहीं , ऊपर से हम देखते रहते है फलाना व्यक्ति ने किसी का पैसा हड़प लिया। बहुत कुछ कहते है पर आपस में दिखाई पड़ता है। जो होना है, समय पर दिखाई पड़ता है। महाभारत
में भी तो यही दिखाई पड़ता है। इतिहास में भी तो यही दिखाया समय आने पर सब हो जाता है मेरे कहने का तात्पर्ये ऐसे है की कर्मफल ऐसे है। सभी को भोगना ही पड़ता है कोई माने या ना माने।
आत्मदेव ब्राह्मण की कथा हम श्रवण कर थे। वो संत महात्मा कहने लगे की सात जन्मों तक आपके कोई पुत्र ,कन्या नहीं है। तुमने ऐसे कोई पुण्य कर्म नही किए है। जिस कर्म के फलसवरूप तुम्हे पुत्र की प्राप्ति हो। अनेक है जो अधिक पुण्य कर्म करते है उन्हें अच्छा पुत्र मिलता है। जिसका भाग्य अच्छा है। अच्छा फल क्यों नहीं मिलेगा। तपे राजा जो तपस्या आदि करते है। श्लोक है , संस्कृत में कठोर तपस्या आदि उनको धन सम्पदा की प्राप्ति होती है। इसलिए किसी को देख कर इर्षा आदि करना उचित नही। लोग जलते है उनके क्यों इतने पैसे आ रहे है मेरे क्यों नही आ रहे? बहुत लोग कहते है हमारे पड़ोस वाले के बहुत कुछ आता है। हमारे कुछ नहीं आता। क्यों नही आता? हमारे कर्म के अनुसार नहीं आता।
तुम्हे कर्म करने का पूर्ण अधिकार है संत महात्मा आत्मदेव के सामने अनेक ज्ञान वैराग्य की कथा सुना रहे है। जिनके चित्त विषयों में लगे हुए है उनको कितनी भी ज्ञान वैराग्य की कथा सुना लो कुछ नहीं होगा। क्या होगा ?
इतने ज्ञान वैराग्य की कथा सुनाने पर भी आत्मदेव ब्राह्मण कहने लगे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हो जाए।
संत महात्मा कहने लगे ठीक है भाई मंत्र जप करके एक फल दे दिया। देखो इस फल को जो है अपनी पत्नी को खिला देना। एक सुंदर बालक जन्म लेगा। आत्मदेव ब्राह्मण ने वो फल ले जाकर के अपनी पत्नी धुंधकारी को दे दिया पत्नी का नाम धुंध परन्तु बड़ी नटखट थी मन ही मन विचार करने लगी कि मैं यह फल खाऊंगी तो मेरा गर्भ बड़ा हो जाएगा ठीक से चल नहीं पाऊँगी। कही चोर डकैत आकर मेरी सारी धन समपत्ति को न ले जाए और मुझे मार न जाए। इसलिए मुझे ये बालक नही चाहिए। ऐसी थी परन्तु ऊपर से बहुत मीठी बातें बोलती थी। परन्तु बहुत झगड़ालू औरत थी। हर किसी के साथ झगड़ा करती थी। मन ही मन विचार करने लगी की मुझे नहीं चाहिए। इसलिए अपने दुःख की बात अपनी दूर के संपर्क बहन को कहने लगी मैं क्या करू ? वो कहने लगी मैं इधर ही हुँ। मैं भी गर्भवती हुँ एक महीने का मेरा गर्भ है। सुन मेरे पति को कुछ पैसा दे देना मेरे पुत्र होने के साथ ही मैं तुमको दे दूँगी। और तुम अपने पेट पर कुछ कपडा आदि बांध लो दूसरों को पता चल जाएगा तुम भी गर्भवती हो। समय आने पर मैं अपना पुत्र तुम्हे दे दूँगी। ऐसा कहने पर धुंधकारी कहती अच्छा ही है, वो जो फल था आँगन में जो गाए थी उसको खिला दिया।
संत महात्मा के मंत्रभुत फल कभी व्यर्थ नही जाता है। आश्चर्य की बात कि आत्मदेव ब्राह्मण किसी कार्ये के लिए बहार गए थे। इसी प्रकार देखते-देखते उनकी सेहली एक बालक को प्रसव दिया। पर रात ही रात में उसके पति ने यहाँ भेज दिया, और किसी को पता ही नही रात के अंधेरे में क्या हुआ। ठीक उसी दिन भगवान की इच्छा से उनकी गाए ने भी एक बहुत सुंदर बालक को जन्म दिया।
बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय, जय श्री राधे श्याम।
आश्चर्ये की बात है सारे गांव के लोग देखने के लिए आए। सारे गांव में तफला मच गया। कहने लगे देखो आत्मदेव ब्राह्मण के कुछ नही था और उसकी पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया साथ ही साथ उनकी गाए ने एक मनुष्य बालक को जन्म दिया।उस बालक के कान जो थे वो गाए जैसे थे। बालक का नाम रख दिया गोकरण और धुंधकारी ने अपने बेटे का नाम रख दिया, क्या रखा ? धुंधकारी। यहा तक की आत्मदेव ब्राह्मण को पता नही था। आत्मदेव ब्राह्मण बड़े प्रसन हुए।
सभी लोग कहने लगे भगवान जिसको देते है छप्पर फाड़ कर देते है। आनन्द हो गया। आनन्द उत्सव हुआ बालक जन्म पर। परन्तु जो बालक संत महात्मा के आशीर्वाद से उत्पन हुआ और धुंधकारी से दोनों का स्वाभाव बिल्कुल अलग है । गौकरण बिल्कुल संत महात्मा की भांति है। विद्वान् है सभी गुरुजनो के आदर करने में परन्तु धुंधकारी विपरीत है। स्कूल जाते थे पढ़ाई नही करते थे। बातो -बातो में दूसरे बालको को भी मार देते थे। ऐसा स्वाभाव था कुटिल स्वाभाव था। छोटे से बचपन में ही कु अभ्यास आदि हो गया बीड़ी पीना शरू क्र दिया था ,धीरे -धीरे तम्बाकु गांजा ,शराब आदि शरू कर दिया। चोरी करना स्वाभाव आदि हो गया, दुराचार आदि करने लगा, दूसरों का पैसा हड़प लेना, दुष संग में ही सदा रहने लगा। असत संग जिसे कहते है। गोकरण विद्वान् समस्त शास्र ज्ञान ग्रहण कर लिया, जहां पर संत महात्मा पंडित लोग रहते वही पर रहता था। इस संसार में बेहूदा नहीं और पशु भी नही है। अपने -अपने स्वाभाव द्वारा सब अपना परिचय देते है। किसी को बोलना नही पड़ता है, जो जैसे स्वाभाव वाले है। तामसिक स्वाभाव वाले को पशु जो सातविक स्वाभाव वाले है उनको देवता कहा जाता है, गीता में भगवान कहते है - इस संसार में दो प्रकार के स्वाभाव वाले लोग है, दुसरे के सहायता करते है, सातविक लोग है गुरुजनो के आदर करते है। सूंदर मधु भाषी होते है। धीरे से बोलते है। किसी को दुःख नही देते है। किसी का दुःख देखकर उनका ह्रदय द्रवीभूत हो जाता है जो सहायता करते है ऐसे को देवता कहा जाता है। इस संसार में कौन देवता हैऔर पशु किसे कहा जाता है तामसिक स्वाभाव वाले को।
एक बार एक संत महात्मा जो है पिता ब्रह्मा जी के पास जाकर बोले आपने देवताओ के जो है स्वर्ग लोक दे दिया और असुरो के जो है नरक दे दिया क्यों ? एक जैसा स्थान क्यों नही दिया?
आपने तो देवता, पशु, असुर, स्त्री सभी बनाया है। आप तो पिता है। आपने एक जो है सुंदर स्थान दे दिया और एक जो है नरक दे दिया। क्यों?
ब्र्ह्मा- मैंने नही दिया वो