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September 30, 2017

श्री गुरु हमारी आत्मा और सर्वसव हैं

श्री गुरु हमारी आत्मा और सर्वसव हैं किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि  हम अन्य श्रेष्ठ वैष्णवों के प्रति श्रद्धा विहिन हो जाए अपने श्री गुरु वैष्णवों के चरणों में एकाग्र बुद्धि रखते हुए अन्य सभी वैष्णवों के प्रति सामान जनक व्यवहार करना चाहिए जिस प्रकार सूर्य की किरणे प्रकाश दायक होते हुए भी सूर्य की प्रधानता है उसी प्रकार हमारे सभी प्रकार के भाव और विचार श्री गुरु पर ही केंद्रित होना चाहिए  श्री  निष्ठा और भक्ति ही हमारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य है और इस  जगत में जीवन व्यापन करते हुए अपने श्री गुरु के प्रति एकांतिक श्रद्धा सर्वश्रेष्ठ सामान का पालन करना  चाहिए श्री गुरु एक शुद्ध और रसिक वैष्णव हैं इस प्रकार के विचार विहीन पर हमारी भक्ति नष्ट हो जाएगी
श्रील गुरुदेव (भक्ति वेदांत श्रील नारायण गोस्वामी गोस्वामी ) एक समय जब श्रील गुरुदेव जब कथा कह रहे थे तो कुछ भक्त हरिकथा के महत्व से अपरिचित होने के कारण इधर-उधर विचरण कर रहे थे जब श्री गुरु उपस्थित हैं और हरि कथा कह रहे हैं तब उसी समय शीघ्रता से उनके पास बैठकर हरिकथा का सेवन करना चाहिए इस प्रकार  के आचरण का पालन ना करने पर ,हमारी हरि, गुरु वैष्णव के प्रति हमारी श्रद्धा पुष्ट नहीं होगी निरंतर ऐसे आचरण से साधक श्रद्धा विहीन हो जाएगा
एक अन्य समय श्रील गुरुदेव जब नाट्य मंदिर में हरिकथा कहने के लिए उपस्थित हुए तब नाट्ये मंदिर में किसी को उपस्थित ना देखकर श्री गुरुदेव ने प्रश्न किया , कि सब भक्त लोग कहाँ हैं ?  इसके उतर में एक भक्त ने कहा कि सभी भक्त व्यक्तिगत समूह में इधर-उधर विचरण कर रहे  हैं श्री गुरु ने कहा की यह गलत है हमें हमेशा श्री गुरु के संनिकट रहने का प्रयास करना चाहिए उत्तम आचरण का पालन करते हुए श्री गुरु के आगमन से पूर्व हरिकथा के स्थान पर उपस्थित हो जाना चाहिए , एक अन्य घटना के  अनुसार श्रील गुरुदेव हरिकथा कहने के लिए उपस्थित हुए भक्तो को वहाँ न देख कर उन्हें बहुत निराशा हुई क्योकि कुछ भक्त हरिकथा सुनने के स्थान
पर श्री गोवेर्धन के लिए उघत हुए और अन्य कुछ भक्त मानसी गंगा गए श्रील गुरुदेव ने व्यक्त किया कि जो लोग हरिकथा में अनुपस्थित हैं  श्री गुरु के चरणों में एकांतिक भक्ति उत्पन नहीं हुई हैं फलस्वरूप वह हरिकथा सुनने के स्थान पर बाहरी क्रिया के प्रति उत्सुक हैं

November 27, 2016

पूर्वजन्म में थे चोर, कैसे बन गए धन के देवता?

story of kuber in shiv puran
भगवान शिव से वरदान पाकर देवताओं के कोषाध्यक्ष बनने वाले भगवान कुबेर के पूर्व जन्म की कहानी जानकर आप हैरान हुए बिना नहीं रहेंगे।

शिव पुराण में बताया गया है कि कुबेर महाराज पूर्व जन्म में गुणनिधि नामक ब्राह्मण थे। बचपन में कुछ दिनों तक इन्होंने धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया लेकिन बाद में कुसंगति में पड़कर जुआ खेलने लगे। धीरे-धीरे चोरी और दूसरे गलत काम भी करने लगे।
पढ़ें,धन और सुख चाहिए, घर में नहीं रखें यह पांच सामान
एक दिन दुःखी होकर गुणनिधि के पिता यज्ञदत्त ने इन्हें घर से निकाल दिया। भटकते हुए गणनिधि एक वन में पहुंचा। भूख प्यास से बुरा हाल हो रहा था। तभी इसने देखा कि कुछ लोग भोग समाग्री लेकर जा रहे हैं।
भोजन को देखकर गुणनिधि की भूख और बढ़ गई। वह लोगों के पीछे-पीछे चल पड़ा। इसने देखा कि लोग शिवालय में जाकर भगवान शिव की पूजा कर रहे हैं। सभी भोग सामग्री शिव जी को अर्पित करके लोग भजन कीर्तन करने लगे।
पढ़ें,वह तीन दिन जब यहां भूतों के आतंक से कोई घर से नहीं निकलता
गुणनिधि मौके की तलाश में था कि कब वह भगवान पर चढ़ाए गए भोग पदार्थों को चुरा ले। रात में जब सभी लोग सो गए तो गुणनिधि दबे पांव मंदिर में जाकर भोग सामग्री चुराकर वापस चल पड़ा।
लेकिन एक व्यक्ति को गुणनिधि का पांव लग गया और वह चोर-चोर चिल्लाने लगा। गुणनिधि जान बचाकर भागा लेकिन नगर रक्षक के तीर का निशान बन गया। गुणनिधि की मृत्यु हो गई।
लेकिन भगवान शिव की कृपा से उसे अनजाने में ही शिवरात्रि व्रत करने का फल प्राप्त हो गया। इसके प्रभाव से अगले जन्म में गुणनिधि कलिंग देश का राजा हुआ। इस जन्म में गुणनिधि शिव का परम भक्त था। इसके पुण्य से भगवान शिव ने कुबेर को यक्षों का स्वामी और देवताओं का कोषाध्यक्ष बना दिया।

September 23, 2016

श्रील गुरुदेव -मलेशिया 

कुआला  लमपुर , मलेशिया 

हरे कृष्णा !

श्रील गुरुदेव अभी मलेशिया में हैं, और गुरुदेव  दिन में दो बार हरि कथा कर रहे है ,


कृपया लाइव ब्रॉडकास्ट को देखे youtube chanel पर। 

ब्रॉडकास्ट सिर्फ सितम्बर 1st, 8 am और  8 pm(कुआला लमपुर लोकल समय) 
जय श्रील गुरुदेव!

July 24, 2016

सुविचार





  😊किसी ने पूछा - 
जब हर कण कण मे भगवान है तो तुम सत्संग क्यूँ जाते हो ?
देने वाले ने बहुत सुंदर जवाब दिया --
"हवा तो धुप में भी चलती है पर, आनंद और चैन, छाँव मे बैठ कर मिलता है।"🌿




आज श्री राधा-कुण्ड की शोभा निराली हो रही है,,श्री प्रियाजी के मन में एक अभिलाषा जगी है कि मैं और प्रियतम होड़ बदकर कुण्ड में तैरने का आनंद लें ,और देखें कि कौन पहले रंग-महल की सीढियों का स्पर्श करता है,,सभी सहचरियां इस बदा-बदी का सोल्लास अनुमोदन करती हैं,श्री प्रिया-प्रियतम कुण्ड के जल में उतर कर तैरने लगते है,साथ में सहचरियां भी तैर रही हैं,कि देखें कौन सर्वप्रथम रंग-महल की सीढियों का स्पर्श करता है,,सहचरियों ने देखा कि श्री प्रियाजी पहले स्पर्श करने वाली हैं,पर अचानक श्री प्रियाजी डुबकी लगा लेती हैं,और श्री प्रियतम बाजी जीत लेते हैं,..
थोड़ी देर बाद श्री ललिताजी श्री प्रियाजी से प्रश्न करती हैं कि ,हे स्वामिनी !जीतते-जीतते डुबकी क्यों लगा ली?
श्री प्रियाजी कहती है,--''मैं अपने प्रियतम की हार नहीं देख सकती,,'''प्रीतम मेरे प्राननि हूँ तें प्यारौ ,,,देखत जाहि परम सुख उपजत,रूप रंग गुन गारौं ''''


मन में बड़ा उतार चढ़ाव होता है भावों का। सत्य कहता हुँ, संतों और रसिकों की समाज में मेरी पहचान मेरे गुरुदेव से होती है तो मन बड़ा खिल उठता है। अपनें को देखता हुँ तो मुँह शर्म से झुक जाता है और गुरुदेव के नाम जुड़नें से ऐसे महान गुरु के शिष्य होने का अभिमान मुख पर आ जाता है।
संत, रसिक मेरी और इशारा कर के मेरा परिचय देते हैं कि यह ' ...के कृपापात्र हैं। वास्तविकता भी यही है, कि गुरुदेव जी की कृपा में कोई कमी नहीं है, इसी पात्र में दोष है, जो उस बरस रही कृपा को पहचान, पकड़, संजो नहीं पाता।
श्री कबीर दास जी के इस दोहे से उनके भाव में अपना भाव मिलानें का प्रयास कर रहा हुँ। सत्य है कि सारी धरती कागज बन जाए, सातों समुद्र का जल अगर स्याही में परिवर्तित हो जाए और सभी वनों के पेड़ कलम रूप धारण कर लें। तब भी मेरे गुरुदेव की महिमा लिखी नहीं जा सकती।
उनकी इतनीं करुणा और अकारण कृपा। आहा! जब अपनें पर ऐसे गुरुदेव की कृपा अनुभूत होती है। तब आपकी कृपा न मिले इसमें कोई संशय नहीं रहता।
🐚🐚🐚


June 22, 2016

भागवत कथा अकोला २०१५

श्री भागवत सप्तहा हमारे प्रिय गुरुदेव भक्ति वेदांत वन गोस्वामी महाराज 

द्वारा, अकोला शहर महारास्ट्रा ,भारत में






श्रील भक्ति वेदांत वन महाराज भागवत सप्ताह २०१५ -श्रीमद् भागवत की कथा श्रवण , कीर्तन के लिए यहाँ आए हैं। सात दिन हम भागवत कथा श्रवण करेंगे। इस भागवत का तात्पर्ये क्या है ?
(भा) शब्द का अर्थ है -प्रकाश ,स्वयं भगवान प्रकाशवान है। इस भागवत कथा को श्रवण करने से हृदय के ताप और अन्धकार नष्ट हो जाएंगे।
जैसे दीपक जला दो तो अन्धकार दूर हो जाता है उसी प्रकार भागवत कथा को श्रवण करने से हृदय के सभी पाप ,ताप और अन्धकार दूर हो जाएंगे।
(ग ) शब्द का अर्थ है - गति ,इस भागवत कथा को श्रवण करने से भगवान सर्वोत्तम गति को प्रदान करते है। धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष यह चतुःपद है। इसके पश्चात् पंचम पुरषार्थ। भगवान इस भागवत प्रेम को जीव के हृदय में प्रदान करते है। गति प्रेम को प्रदान करते है।
(त ) शब्द का अर्थ हैं - तारण भगवान समस्त दुःखो का तारण करते है।
(व ) शब्द का अर्थ है - वरिष्ठ जितने भी प्रकार के ग्रन्थ है वेद ,पुराण भागवतम सबसे वरिष्ठ ग्रन्थ है।
इसी प्रकार हमारे आचार्यपाद नें भागवत कथा का वर्णन किया है।
सात दिन ही क्यों भागवत कथा करते है ? ८ दिन क्यों नही ? १५ दिन क्यों नही ?
सप्त दिन ही क्यों ? इस संदर्भ में हमारे आचार्यपाद कहते हैं
नित्यम् भागवत सेव्याः।।
नित्यम हर रोज ,प्रतिदिन भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए। कितने
दिन होते है ? सात दिन सोम ,मंगल, बुध, वीर ,शुक्र शनि रवि। आठवा दिन है ही नहीं, इसलिए कहा "नित्यं भागवत सेव्यम् " शरीर में सात ग्रन्थियाँ है। भागवत कथा श्रवण करने से सात ग्रन्थियाँ जो है वो नस्ट हो जाती है। हमारे शरीर मे साथ गाँठ लगी हुई है। जैसे हम किसी को रस्सी से बांध देते हैं और सात गाँठ लगा देते है। रक्त ,रस ,मास, मजक ,चामबक हाठी। सबसे बड़ी गाँठ किस में है इस संसार में। हम बंध गए है ये सबसे बड़ी गाँठ है। परन्तु जीव भागवत कथा श्रवण कर इस संसार की ग्रन्थिओ और बन्धनों से मुक्त हो कर भगवान को प्राप्त कर सकता है।



June 21, 2016

मेरे प्रिय गुरुदेव -श्रील गुरुदेव


श्रील गुरुदेव ने अपने प्रिय गुरदेव के बारे में कहा 







जब मैं देवानंद गौड़िया मठ में आया तो गुरुदेव नें मुझे हरिनाम दिया। अपनी जप माला दिखा कर पहले कि यह जप माला हैं और यही वो माला है जो गुरुदेव ने मुझे ३० साल पहले दी थी। जब मैं गुरुदेव के कमरे में आया तो उन्होंने पूछा कि तुम कहाँ से हो?  मैंने बताया कि कृष्ण क़ृपा मेरे चाचा हैं, कृष्ण कृपा ब्रहम्चारी और अब वो श्रील मधुसूदन महाराज जी हैं देवानन्द गौड़ीय मठ के। श्रील मधुसूदन महाराज जी मेरे चाचा है वो ७५ साल के हैं। देवानन्द गौड़िय मठ में वह श्रील भक्ति  प्रज्ञान  केशव गोस्वामी महाराज  के साथ थे।  जब वो ७ या ८ साल के थे तब उन्होने अपना गृह का त्याग कर दिया ओर देवानन्द मठ आ गए और गुरुदेव से मिले। गुरुदेव का उनके  प्रति बड़ा ही स्नेह था। 

जब मैं गुरुदेव से पहली बार मिला तो उस समय उन्होंने मुझे हरिनाम दिया। कभी -कभी मैं भक्ति रक्षक श्री धर महाराज जी के मठ जाता था उनकी हरि कथा सुनने। मेरा उनसे बड़ा प्रेम और स्नेह था और उन्होने यह  भी कहा कि में मठ रुक सकता हुँ। तब मैने कहा कि मैं अपने श्रील नारायण गोस्वामी महाराज और अपने चाचा के साथ देवानन्द गौड़ीय मठ में रहता हुँ। उस समय में, मैं केवल २० या २१ साल का था। मैने अभी कोलकत्ता यूनिवर्सिटी से अर्थ शास्त्र की पढ़ाई खत्म की थी। मैं अभी अपनी तरूड अवस्था में था और गुरुदेव काफी विनर्म स्वभाव के थे और मैं उनके साथ रहता था। काफी वर्षो तक  मैंने अपने चाचा मधुसूदन महाराज जी की सेवा की। एक साल बाद फिर गुरुदेव ने मुझे अपने साथ मथुरा चलने को कहा फिर मैं मथुरा आ गया। मैं हमेशा गुरुदेव की सेवा में लगा रहता उनके लिए खाना बनाता उनके चरणों की मालिश करता। (भक्त : और तीर्थ महाराज जी भी )


श्रील गुरुदेव : जब मैं उस समय आया तो श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी शास्त्र के अध्यन में मगन रहते थे। उन्होंने भी सेवा की थी लेकिन जब मैं आया तो तब हम गुरुदेव की सेवा  करते थे। तुम जानते हो , जो भक्ति में नए आए  है गुरुदेव बहुत कृपालु थे हमें भी अपनी सेवा का मौका देते थे। उस समय हम बहुत कम ब्रह्मचारी थे शायद  ५  या  ६ ब्रह्मचारी। प्रेमानन्द प्रभु ,तीर्थ महाराज , माधव महाराज , मैं  और कृष्णदास, जो अब  विवाहित  हैं बाकी लोग आते थे चले जाते थे पर हम हमेशा उनके साथ रहते थे। फिर कुछ वर्षो के बाद रसानंद जो अब श्री धर महाराज ,आए लेकिन वो वृंदावन में रुके। परन्तु  हम हमेशा गुरुदेव के साथ रुकते थे गुरुदेव जहा वहां हम सब साथ में।